در آوارِ خونينِ گرگوميش
ديگرگونه مردی آنک،
که خاک را سبز میخواست
و عشق را شايستهیِ زيباترينِ زنانــ
هديتی نه چنان کمبها بود
که خاک و سنگ را بشايد.
| چه مردی! چه مردی! |
| | که میگفت |
قلب را شايستهتر آن
| که با هفت شمشيرِ عشق |
| | درخوننشيند |
و گلو را بايستهتر آن
| که زيباترينِ نامها را |
| | بگويد. |
و شيرآهنکوه مردی ازاينگونه عاشق
ميدانِ خونينِ سرنوشت
| به پاشنهیِ آشيل |
| | درنوشت.ــ |
| رويينهتنی |
| | که رازِ مرگاش |
اندوهِ عشق و
غمِ تنهايی بود.
| «ــ | آه، اسفنديارِ مغموم! |
| | تو را آن بِه که چشم |
| | فروپوشيدهباشی!» |
| «ــ | | آيا نه | | | يکی نه | | | | بسنده بود | | | | | که سرنوشتِ مرا بسازد؟ |
|
| | صدايی بودم من |
| | ــ شکلی ميانِ اشکالــ، |
| | و معنايی يافتم. |
من بودم
و شدم،
| نه زان گونه که غنچهيی |
| | گلی |
| راست بدان گونه |
| که عامیمردی |
| | شهيدی |
تا آسمان بر او نمازبرد.
| من بینوا بندهگکی سربهراه |
| | | نبودم |
و راهِ بهشتِ مينویِ من
| بُزروِ طوع و خاکساری |
| | نبود: |
مرا ديگرگونه خدايی میبايست
شايستهیِ آفرينهيی
| که نوالهیِ ناگزير را |
| | گردن |
| | | کجنمیکند. |
و خدايی
ديگرگونه
آفريدم».
| دريغا شيرآهنکوه مردا |
| | که تو بودی، |
و کوهوار
پيش از آن که بهخاکافتی
| نستوه و استوار |
| | مردهبودی. |
اما نه خدا و نه شيطانــ
| سرنوشتِ تو را |
| | بُتی رقمزد |
| بتی که |
| | ديگراناش |
| | | | میپرستيدند. |